राजस्थान के दुर्ग एवं दुर्ग स्थापत्य
राजस्थान को "गढ़ों और दुर्गों की भूमि" कहा जाता है। यहाँ के दुर्ग केवल सैन्य सुरक्षा के साधन नहीं थे, बल्कि वे तत्कालीन राजनीतिक शक्ति, स्थापत्य-कला, सांस्कृतिक समृद्धि तथा राजपूत वीरता के प्रतीक भी रहे हैं। अरावली पर्वतमाला, मरुस्थलीय क्षेत्र, पठार तथा मैदानी भू-भाग जैसी विविध भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप राजस्थान में विभिन्न प्रकार के दुर्गों का निर्माण हुआ, जो भारतीय दुर्ग स्थापत्य की उत्कृष्ट परंपरा को प्रदर्शित करते हैं।
राजस्थान के दुर्गों में स्थानीय निर्माण सामग्री, जल संरक्षण प्रणाली, प्राकृतिक सुरक्षा, राजमहल, मंदिर, प्राचीर, बुर्ज तथा प्रवेश द्वारों का वैज्ञानिक एवं कलात्मक समन्वय देखने को मिलता है। इन्हीं विशिष्ट विशेषताओं के कारण चित्तौड़गढ़, कुम्भलगढ़, रणथम्भौर, गागरोन, आमेर तथा जैसलमेर सहित राजस्थान के छह पर्वतीय दुर्गों को वर्ष 2013 में यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया।
- दुर्गों की संख्या की दृष्टि से महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के बाद राजस्थान का भारत में तीसरा स्थान है।
- राजस्थान में लगभग 250 दुर्ग हैं।
- रियासतों की दृष्टि से सर्वाधिक दुर्ग मेवाड़ रियासत में हैं तथा जिलों की दृष्टि से सर्वाधिक दुर्ग जयपुर जिले में हैं।
- श्यामलदास के ग्रंथ "वीर विनोद" के अनुसार मेवाड़ में कुल 84 दुर्ग हैं जिनमें से 32 दुर्गों का निर्माण महाराणा कुंभा नर करवाया।
- राजस्थान में दुर्ग स्थापत्य का स्वर्ण काल महाराणा कुंभा के शासन काल को माना जाता है।
दुर्गों के प्रकार :-
- चाणक्य /कौटिल्य/विष्णुगुप्त की पुस्तक 'अर्थशास्त्र' में दुर्ग के 4 प्रकार बताएं हैं।
- पर्वत /गिरी दुर्ग - पर्वत पर बना दुर्ग
- धान्वन दुर्ग - रेगिस्तान मे बना दुर्ग
- औदक दुर्ग - जल राशि / नदी के बीच बना दुर्ग
- वन दुर्ग - जंगल से घिरा दुर्ग / जंगल में बना दुर्ग
- विष्णु संहिता/ विष्णु धर्म सूत्र के अनुसार 6 प्रकार के दुर्ग बताएं गए हैं।
- वार्क्ष दुर्ग - लता, झाड़ियों व कंटीले वृक्ष से घिरा दुर्ग
- स्थल दुर्ग/ महि दुर्ग - खुले स्थान पर बना दुर्ग
- नृदुर्ग - चतुरंगिणी सेना से घिरा दुर्ग
- गिरी दुर्ग - पर्वत पर बना दुर्ग
- धान्वन दुर्ग - रेगिस्तान मे बना दुर्ग
- जल दुर्ग - जल राशि / नदी के बीच बना दुर्ग
- शुक्राचार्य की शुक्र नीति के अनुसार दुर्ग 9 प्रकार के बताएं गए हैं।
- पारिध दुर्ग - मजबूत परकोटे/ दीवार से रक्षित दुर्ग - राजस्थान के अधिकतर दुर्ग जैसे कुंभलगढ़, चित्तौढ़ग़ढ़ आदि
- पारिख दुर्ग - पानी की गहरी खाई से रक्षित दुर्ग, जैसे लौहागढ़ (भरतपुर), जूनाग़ढ़, अहिच्छात्रदुर्ग
- जल दुर्ग - नदी मे बना दुर्ग / प्राकृतिक जल राशि से घिरा दुर्ग जैसे गागरौन (आहू एवं कालिसिन्ध नदी) , भैसरोडगढ़ (चम्बल नदी), शेरगढ़ बारां (परवन), शेरगढ़ -धौलपुर (चम्बल नदी), चित्तौड़गढ़ (गंभीर एवं बेड़च)
- धान्वन दुर्ग - रेगिस्तान मे बना दुर्ग जैसे भटनेर दुर्ग, जूनागढ़ दुर्ग, जैसलमेर दुर्ग
- गिरी दुर्ग - पर्वत पर बना दुर्ग, राजस्थान के सर्वाधिक दुर्ग इस श्रेणी के हैं।
- सैन्य दुर्ग -व्यूह रचना में माहिर सेना से रक्षित दुर्ग जैसे चित्तौड़गढ़ दुर्ग
- सहाय दुर्ग - विश्वसनीय परिजनों व सैनिकों से रक्षित दुर्ग, जिसे सिवान दुर्ग, झाइन दुर्ग
- ऐरण दुर्ग - कंटीली झाड़ियों, पत्थरों, गढ़्ढों व ऊबड़ खवाड़ मार्ग वाला दुर्ग जैसे रणथंभौर दुर्ग, सिवाना दुर्ग, जालौर दुर्ग, चित्तौड़गढ़ दुर्ग
- वन दुर्ग - जंगल से घिरा दुर्ग / जंगल में बना दुर्ग जैसे रणथंभौर दुर्ग, सिवाना दुर्ग, जालौर दुर्ग, चित्तौड़गढ़ दुर्ग
चित्तौड़गढ़ दुर्ग :-
स्थिति - मेसा के पठार की चित्रकूट पहाड़ी पर, गंभीरी - बेड़च नदी के संगम पर
धान्वन दुर्ग को छोड़कर सभी 8 श्रेणियों में आता है।- निर्माण - 7 वीं सदी में चित्रांग मोरी/ चित्रांगद मौर्य ने बनवाया।
- आधुनिक स्वरूप व टेढ़े मेढ़े सात दरवाजों वाले मार्ग का निर्माण महाराणा कुम्भा ने करवाया
- प्राचीन प्रवेश द्वार - सुराजपोल
- कुंभा द्वारा बनवाए 7 दरवाजे ( ऊपर से नीचे की ओर)
- रामपोल - इस दरवाजे पे फत्ताजी की छतरी बनी हुई है
- लक्ष्मणपोल
- जोडलापोल
- गणेशपोल
- हनुमानपोल
- भैरवपोल - इस दरवाजे पर जयमाल मेड़तिया व कल्लाजी राठौड़ की छतरियाँ बनी हुई हैं।
- पाण्डनपोल - इस दरवाजे पर रावत बाघसिंह की छतरी बनी हुई है।
- उपनाम -
- त्याग और बलिदान का प्रतीक
- दुर्गों का सिरमौहर
- मालवा का प्रवेश द्वार
- राजस्थान की दक्षिणी-पूर्वी सीमा का प्रहरी
- दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान का प्रवेश द्वार
- सर्वाधिक साकों वाला दुर्ग
- मेवाड़ का कीर्तिगढ़
- राजस्थान का गौरव
- मेवाड़ का स्वाभिमान
- तीन साकों वाला दुर्ग
- स्वाभिमान का प्रतीक
- व्हेल मछली के आकार का दुर्ग - सर ह्यूज कैसर ने कहा
- राजस्थान का सबसे बाद लिविंग फोर्ट
- खेती होने वाला एक मात्र दुर्ग
- दुर्गों का तीर्थ
चित्तौड़गढ़ दुर्ग के साके
- प्रथम साका 1303 ईस्वी में
- अलाउद्दीन खिलजी ने आक्रमण किया
- केसरिया राणा रत्न सिंह के नेतृत्व में सेनापति - गौरा एवं बादल
- जौहर - महारानी पद्मिनी के नेतृत्व में
- इस साके के बाद अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़गढ़ का नाम अपने बेटे के नाम पर खिज़्राबाद कर दिया।
- दूसरा साका - 1535 ईस्वी में
- गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने आक्रमण किया
- शासक - विक्रमादित्य ननिहाल (बूंदी) चल गया
- राजमाता कर्मावती ने मदद के लिए हुमायूँ की राखी भेजी, लेकिन हुमायूँ की आने मे देरी हो गई
- केसरिया - रावत बाग सिंह के नेतृत्व में
- जौहर - कर्मावती के नेतृत्व मे
- तीसरा साका - 1568 ईस्वी में
- अकबर ने आक्रमण किया
- शासक - महाराणा उदयसिंह किले की बागडोर जयमल मेड़तिया और फतह सिंह सीसोदिया (फत्ता) को सौंपकर गोगुन्दा चले गए।
- केसरिया - जयमल मेड़तिया - फतह सिंह सीसोदिया (फत्ता) के नेतृत्व में
- जौहर - फत्ता की पत्नी फुलकँवर के नेतृत्व में
- इस युद्ध में कल्ला जी ने अपने चाचा जयमल मेड़तिया को अपने कंधों पर बैठा कर युद्ध लड़ा और चार हाथों वाले देवता कहलाये
चित्तौड़गढ़ दुर्ग के प्रमुख स्थल
मंदिर
- त्रिभुवन नारायण / समिद्देश्वर/ मोकलजी का मंदिर
- कुम्भश्याम मंदिर (मीरा मंदिर)
- बायण माता मंदिर
- अन्नपूर्णा विरवडी माता का मंदिर
- कालिका मंदिर (सूर्य मंदिर)
- कुम्भ स्वामी मंदिर
- श्याम पार्श्व मंदिर
- सात बीसी देवरी
- श्रंगार चवरी मंदिर
- अद्भुतजी मंदिर/ अदबजी मंदिर
- कुकडेश्वर मंदिर
- शांतिनाथजी मंदिर
- तुलजा भवानी
चित्तौड़गढ़ के महल
- पद्मिनी महल
- आहड़ा हिंगोला महल
- फतह प्रकाश महल - म्यूजियम है।
- कुम्भा महल
- कुंवरपदे के महल
- जयमल की हवेली
- भामाशाह की हवेली
- आवला महल
- गौरा बदल महल
चित्तौड़गढ़ के जलाशय / पेयजल स्रोत
- घी-तेल बावड़ी
- घोसुंडी बावड़ी
- रतनेश्वर बावड़ी
- भीमतल तालाब
- गौमुख झरना
- सूर्य कुंड
- कुम्भ सरोवर
- हाथीकुंड
- चन्दा बावड़ी
- चित्रांग मोरी तालाब
चितौड़गढ़ दुर्ग के अन्य महत्वपूर्ण स्थल
- नौलखा भंडार - अन्तः लघु दुर्ग है, बनवीर ने निर्माण करवाया
- रैदासजी की छतरी - कुम्भ श्याम/ मीरा मंदिर में है
- लाखोटा की बारी - गुप्त प्रवेश द्वारा
जैन कीर्ति स्तम्भ
- आदिनाथ / ऋषभदेव को समर्पित है
- 12 वी सदी में जैन व्यापारी जीजकशाह बघेरनाल ने करवाया
- सात मंजिला, 72 फुट ऊंचा (आधार सहित 75 फुट ऊंचा)
विजय स्तम्भ
- निर्माण - 1440 से 1448 तक राणा कुम्भा ने करवाया
- सारंगपुर युद्ध विजय/ मालवा विजय/ मांडू विजय के उपलक्ष में बनवाया
- वास्तुकार - जैता, नापा, पोमा, पुंजा
- आकृति डमरू जैसी है
- 9 मजिल 112 फुट ऊंचा
- भगवान विष्णु को समर्पित है।
- तीसरी बार 9 बार अल्लाह - बिस्मिल्लाह लिखा हुआ है
- कीर्ति स्तमभ प्रशस्ति - संस्कृत भाषा में, लेखक अत्रीभट्ट, महेश भट्ट
- सीढ़ियाँ 157, 8 वर्ष में बना, 90 लाख लागत
- अन्यनाम / उपनाम
- कुतुबमिनार से भी श्रेष्ठ - कर्नल जेम्स टॉड़
- रोम के टार्जन टावर से श्रेष्ठ - फर्ग्यूशन ने कहा
- भारतीय लोक जीवन का रंगमंच
- भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोश - डॉ गेटज
- मूर्तियों का अजायबघर - डॉ गेटज
- भारतीय प्रतिमा शास्त्र की अनुपमं निधि - आर पी व्यास
- विष्णु स्तम्भ - सी वी वैद्य
- विष्णु ध्वज - उपेन्द्रनाथ
भारत सरकार ने 1949 में विजय स्तम्भ पर 1 रुपये का डाक टिकट जारी किया, यह राजस्थान की किसी धरोहर पर जारी होने वाला प्रथम डांक टिकट था।
विजय स्तमभ राजस्थान पुलिस और माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का प्रतीक चिन्ह है।
इसे हिन्दू कीर्ति स्तम्भ या विष्णु कीर्ति स्तम्भ भी कहते हैं।
नैणसी ने चित्तौड़गढ़ किले ले बारे मे कहा - गढ़ तो चित्तौड़गढ़ बाकी सब गढ़ैया।
कुंभलगढ़ दुर्ग
- अवस्थिति - सादड़ी के पास (राजसमंद), गदमादन पर्वत /जरगा की पहाड़ी पर बना है
- निर्माण - 1443 ईस्वी में महाराणा कुंभा ने निर्माण शुरू करवाया, 1458 मे पूरा हुआ।
- वास्तुकार/ शिल्पी - मंडन
- उपनाम
- माहौर दुर्ग
- मछन्दर दुर्ग
- कुंभलमेर दुर्ग
- मेवाड़ की संकटकालीन राजधानी
- मेवाड़ की आँख
- मेवाड़ की तीसरी आँख
- एटूस्कन दुर्ग - कर्नल जेम्स टौड़
- कटारगढ़ दुर्ग
- विश्व की दूसरी सबसे दीवार, लंबाई - 36 किमी, 4 घुड़सवार एक साथ चल सकते हैं।
- कटारगढ़ दुर्ग - कुंभलगढ़ दुर्ग मे स्थित अन्तः दुर्ग इसे की मेवाड़ की आँख कहते हैं।
- कटारगढ़ के बादल महल की जूनी कचहरी में 9 मई 1540 के दिन महाराणा प्रताप का जन्म हुआ।
कुंभलगढ़ दुर्ग में स्थित प्रमुख स्थल
- मामादेव मंदिर/ वराह मंदिर में कुंभलगढ़ प्रशस्ति
- नीलकंठ महादेव मंदिर - कर्नल जेम्स टौड़ इसे यूनानी शैली का बताया
- कुम्भस्वामी मंदिर
- महाराणा कुंभा की छतरी
- उड़णा राजकुमार पृथ्वीराज की छतरी
- बादल महल
- पन्ना धाय महल
- कनवास महल
- झाली रानी का महल
इसे मेवाड़ सीमा का प्रहरी या मेवाड़ - मारवाड़ की सीमा का प्रहरी कहा जाता है।
इसे मारवाड़ के सीने पर उठी हुई तलवार (तरवार) भी कहते हैं।
इसे मेवाड़ का मेरुदंड भी कहते हैं।
कुंभलगढ़ दुर्ग को देखकर अबुल फ़ज़ल ने कहा कि - नीचे खड़ा व्यक्ति यदि इसे देखे तो उसके सिर की पगड़ी गिर जाए।
कुंभलगढ़ दुर्ग में घटित महावतपूर्ण घटनाएं
- उदय सिंह को शरण डी - आशादेव पूरा
- महाराणा प्रताप का जन्म व विधिवत राज्याभिषेक
- कुंभा के पुत्र उदा ने कुंभा की हत्या की थी
Note :- मौर्य सम्राट अशोक के पोते संप्रति द्वारा बनाए गए मछेन्द्र दुर्ग के अवशेषों पर ही महाराणा कुम्भा ने अपनी रानी कुम्भलदेवी के लिए निर्माण करवाया था ।
गागरौन का दुर्ग
- स्तिथि - आहू - काली सिंध नदी के संगम पर, सामेलणी नामक चट्टान पर बना हुआ है।
- राजस्थान का सर्वश्रेष्ठ जल दुर्ग है।
- निर्माण - 12 वीं सदी मे परमार वंश के राज्य बीजलदेव डोड ने बनवाया।
- उपनाम :-
- डोडगढ़
- गर्गराटपुर
- ढुलरगढ़
- गंगारुण
दुर्ग के प्रमुख स्थल :-
- प्रवेश द्वार का नाम बुलंद दरवाजा - औरंगजेब ने बनवाया
- पीपाजी की छतरी व पैनोरमा
- मिट्ठेशाह की दरगाह - हमीदुद्दीन गागरौनी ने निर्माण करवाया
- परकोटे का नाम - जालिक कोट, झाला जालिम सिंह ने बनवाया
- मधुसूधनजी का मंदिर
- अचलदास खींची महल
- शत्रुयों पर पत्थर बरसाने वाला यंत्र : अर्रादा / ढेकुली
- अपराधियों को सजा देने का यंत्र : गिद्ध कराई
- गागरौन का दुर्ग हीरामन नस्ल के गागरौनी तोते के लिए प्रसिद्ध है।
गागरौन दुर्ग में दो साके हुए
- प्रथम सका 1423 ईस्वी में
- राज्य - अचलदास खींची - केसरिया किया
- रानी - लाला मेवाड़ी, उमादे साँखली - जौहर किया
- गागरौन दुर्ग पर माण्डू/ मालवा के शासक होशंगशाह ने आक्रमण किया
- गागरौन के प्रथम साके का वर्णन शिवदास गाड़ण ने अपने ग्रंथ "अचलदास खींची री वचनिका" मे किया है।
- दूसरा साका : 1444 ईस्वी में
- राजा - पाल्हणसी खींची
- गागरौन पर मालवा के शासक महमूद खिलजी प्रथम ने आक्रमण किया और किले का नाम बदल कर "मुस्तफाबाद" रखा।
बीकानेर के राजकुमार पृथ्वीराज राठौड़ ने अपना प्रसिद्ध ग्रंथ 'वेली क्रिसन रुक्मणी री' इसी दुर्ग में लिखा।
जैसलमेर दुर्ग
जारी..........





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